हिंदी समलैंगिक चुदाई कहानी – स्टाकहोम सिंड्रोम – ३


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हिंदी समलैंगिक चुदाई कहानी

“मयंक … मयंक … कहाँ गए भैय्या .. ?”
मयंक दौड़ा दौड़ा झोंपड़े तक आया। सुकेश जलती हुई लालटेन लेकर खड़ा था।
“कहाँ थे?” सुकेश ने पूछा।
“और तुम कहाँ थे? मैं बहुत डर गया था।” मयंक ने शिकायत वाले लहज़े में कहा।
” अरे मेरी जान, मैं थोड़ा खेत में काम करने चला गया था।” सुकेश ने मुस्कुराते हुए कहा और अपनी बाहें फैला दी। दोनों गले लग गए।

अब दोनों में आत्मीयता आ गयी थी।

सुकेश ने हलके से मयंक के गाल पर चूम लिया। मयंक को अच्छा तो लगा, लेकिन उसे बियर की हलकी से गंध भी आ गयी। सुकेश भाईसाहब पी कर आये थे।
“चढ़ा कर आये हो क्या?
“हे हे हे …!! ” सुकेश ने खींसे निपोरते हुए कहा ” हाँ ..!!”
“तुम भी पियोगे?” सुकेश ने मुस्कुराते हुए मयंक के आँखों में देखते हुए कहा। मयंक भी मुस्कुरा दिया। सुकेश ने थैले में से किंगफिशर की बोतल निकाल ली और मयंक को थमा दी। मयंक ने मुस्कुराते हुए दांतों से उसका कैप हटाया और गटा-गट पीने लगा।
“तुम नहीं लोगे और?”
” हा .. हा .. ” सुकेश की हंसी छूट गयी “मैं पहले से टुन्न हूँ। तुम पियो।”
मयंक वहीँ चौखट पर बैठ गया और सुकेश को देख देख-देख कर पीने लगा। हल्का हल्का उसे भी नशा चढ़ने लगा।
अब दोनों को एक दूसरे को नशे में देख कर मुस्कुरा रहे थे।
सुकेश भी मयंक के बगल जा बैठा।

“ज़्यादा टुन्न मत हो जाना, वरना तुम्हे संभालना मुश्किल हो जायेगा. वैसे भी तुम्हे झेलना बहुत मुश्किल काम है।” सुकेश ने व्यंग्य मर।
अचानक मयंक बीयर पीते पीते रुक गया और सुकेश को घूरने लगा।
“क्या मतलब?”
अब सुकेश सकपका गया ” अरे … मेरा मतलब वो नहीं था … तुम तो बहुत प्यारे लड़के हो … मेरा मतलब ये था की तुम कही लड़कियों की रोने मत लगो …”
“मुझसे परेशान हो?” मयंक ने सवाल दागा .
“नहीं रे चूतिया … तुम हर चीज़ का उल्टा मतलब क्यूँ निकालते हो? ” सुकेश हड़बड़ा कर बोला “मेरा कहने का मतलब ये है की हम तुमसे परेशान बिलकुल नहीं हैं, लेकिन डरते हैं की तुम कहीं दुखी न हो जाओ।”
मयंक ने कोइ जवाब नहीं दिया और शांति से बियर पीने लगा।
“यार .. तुम नाराज़ हो गए …” सुकेश ने मयंक की गर्दन में हाथ डाला और उसके गाल पर चुम्मा जड़ दिया।
“मेरे मुन्ना … मेरे बाबू … ” वो उसी तरह मयंक की गर्दन में हाथ डाले उसे पुचकारता रहा।
मयंक ने अब बोतल छोड़ कर अपना सर सुकेश के कंधे पर रख दिया।
“सुकेश … मैं कब जाऊंगा यहाँ से?” उसने रोनी आवाज़ में सुकेश से कहा।
“बस मेरी जान … “उसने मयंक के सर पर फिर से चुम्मा जड़ा “मैं सुनता हूँ की सरकार ने मांगे मन ली हैं … बस तुम्हे शायद एक दो दिन के अन्दर ही जाने दें”
मयंक उसके कंधे पर यूँ सर रखे बैठा रहा।
“एक बात बताओ मेरी जान, जब तुम यहाँ से चले जाओगे तब तुम्हे हमारी याद आएगी?” उसने मयंक से पूछा।
मयंक ने सुकेश को गौर से देखा और मुस्कुराते हुए बोला “बिलकुल नहीं”
“अच्छा …?!!” सुकेश ने मयंक को अपनी बाँहों में कस कर भींच लिया “अब तो तुम्हे बिलकुल नहीं जाने देंगे … ”
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दोनों पर नशा सवार था। लालटेन की रौशनी और रात की शान्ति में दोनों ऐसे ही बैठे थे।
तभी उन्हें पीछे से आवाज़ आई : “सुकेशवा …. कहा है रे?”
ये जानी पहचानी आवाज़ उसकी भाभी की थी। सुकेश हड़बड़ा कर उठा और आवाज़ की दिशा में देखने लगा। तभी झोंपड़े के पीछे से हाथ में लालटेन लिए उसकी भाभी आ गयी।
“कैसे हो मयंक भैय्या?” भाभी ने मयंक से पूछा।
मयंक बियर के नशे में मुस्कुरा कर बोला “अच्छा हूँ।”
“चलो अच्छा है। कम से कम आपका मन तो लगा। ये आपका ध्यान रखता है की नहीं?” भाभी ने सुकेश की तरफ इशारा करके पूछा।
मयंक ने सुकेश की तरफ देखा और खिलखिला कर हंस दिया। भाभी भी मुस्कुरा दी और सुकेश को मीठा झिड़कते हुए बोली “क्यूँ रे … क्या बात है?”
सुकेश भी मुस्कुरा दिया।
“अच्छा लो, मैं आप दोनों का भोजन लायी हूँ और ये दूसरी लालटेन रख लो, इसमें पूरा तेल भरा है। तुम्हारी वाली में ख़तम होने वाला होगा।”
भाभी ने खाने की पोटली अन्दर रख दी। जाते-जाते बोली “मैं राघव भैया का सामान लौटा दूंगी। तुम मत जाना।” उसने उनके दोपहर के खाने की पोटली उठा ली। “और सुनो … सुबह जल्दी आ जाना, तुम्हारे भैया को बाज़ार जाना है।”

“आओ भोजन कर लो।” भाभी के जाने के बाद सुकेश मयंक को अन्दर ले गया, और भोजन लगा दिया।
“तुम्हारी भाभी को पता तो नहीं चला?” मयंक ने पूछा।
“किस बारे में?”
“ये बियर जो पी है।”
” उसे मालूम है की मैं पीता हूँ। और जहाँ तक तुम्हारी बात है, तुम्हारे चेहरे से पता नहीं चल रहा था।”
“हा हा हा ” मयंक फिर से हँस दिया।
” बहुत हँस रहे हो ?” सुकेश ने चुटकी ली।
“तुम्हे मेरे हंसने से दिक्कत है?”
“अरे नहीं रे। कम से कम तुम हँसे तो। हँसते हुए बहुत प्यारे लगते हो। तुम्हे रोज़ शाम को बियर पिलायेंगे ”
“अच्छा … ? चलो, खाना खाओ, बातें मत बनाओ।”
दोनों ने खाना ख़तम किया और हाथ मुंह धोने के बाद लेट गए। सुकेश ने लालटेन बुझा दी।
मयंक रात की शांति को महसूस करने लगा। बहार झींगुरों का शोर था, साथ में हवा भी पेड़ों को हलके हलके सहला रही थी, मानो उन्हें थपकियाँ देकर सुला रही हो।
इस बियर की मेहरबानी से वो अपने डर से बहार आकर गाँव की निर्मल शान्ति को महसूस कर रहा था।
सुकेश सरक कर मयंक के पास आ गया।
“सो गए क्या?”
“नहीं। क्यूँ ?” मयंक ने पूछा।
“बस ऐसे ही। तुम्हे पता है, आज तुम इतने दिनों में पहली बार हँसे हो।”
मयंक मुस्कुरा दिया और सुकेश की तरफ करवट कर दी।
” हे हे … सब विजय माल्या की मेहरबानी है।”
“एक बात बताओ … सच सच … तुम्हे हमारी याद आयेगी की नहीं?” सुकेश के पूरी चढ़ी हुई थी। मयंक हल्का सा झल्ला गया। ” चल … मुझे नहीं आयेगी तुम्हारी याद। क्यूँ याद करूँगा तुम लोगों को? और वैसे भी, क्या तुम्हे मेरी याद आयेगी? ”
सुकेश ने अपनी बांह मयंक की छाती पर रख दी ” हमें तो तुम बहुत याद आओगे ”
“चल … झूटा !!” मयंक ने मीठी झिड़क दी।
” झूट नहीं बोल रहा हूँ … ” सुकेश ने उसके गाल पर चुम्मा जड़ दिया फिर से “भाभी भी कह रही थी की मयंक बहुत प्यारा बच्चा है।”
“अच्छा .. वैसे भूलूंगा तो मैं भी नहीं कभी ये दिन।” मयंक सुकेश के पास सरक कर आ गया।
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दोनों की सांसे एक दूसरे से टकराने लगीं। दोनों की आँखों में नशे की खुमारी थी।
” हमसे मिलने आओगे?” सुकेश ने पूछा।
“मुझे तो रास्ता ही नहीं मालूम ”
“कोइ बात नहीं, हम बता देंगे। लेकिन फिर तुम्हे आना पड़ेगा।”
“ठीक है, आ जाऊंगा। लेकिन अगर नहीं आया तो?”
“तो तुम्हे फिर से उठा लायेंगे।” सुकेश ने मयंक को अपनी छाती से लगा लिया। मयंक ने अपना सर उसकी छाती से सटा दिया। सुकेश हलके हलके उसके बाल सहलाने लगा।
मयंक ने अपना हाथ सुकेश की छाती पर रख दिया।

दोनों का आलिंगन पूरा हो गया। दोनों एक दूसरे की बदन की गर्मी महसूस करने लगे। दोनों जांघों के बीच के अंग में खून का बहाव बढ़ने लगा।
सुकेश अभी भी मयंक के बालों को सहला रहा था।
दोनों की जांघे एक दुसरे से छू रही थी। दोनों को एक दूसरे के अंग की सख्ती का एहसास होने लगा। दोनों एक दूसरे की शरीर की गर्मी में पिघलने लगे। फिर न जाने कैसे दोनों का आलिंगन मज़बूत हो गया।

सुबह तक दोनों एक दूसरे से लिपटे सोते रहे। आँख खुलने के बाद दोनों नहाने धोने नहर तक गए। बाग वाली नाली में पानी नहीं था। नहर पर सन्नाटा था, सिर्फ एक छिछली, मद्धम गति से बहती पानी की धारा। सबसे पहले सुकेश उतरा। मयंक थोड़ा हिचकिचाने लगा।
“अरे आओ यार, मैं हूँ न।” सुकेश ने अपना हाथ मयंक की तरफ बढ़ा दिया। मयंक ने हाथ थाम लिया और नहर में उतर आया। कमर तक पानी था।

“डरो मत .. डूबोगे नहीं।”
मयंक मुस्कुरा दिया। सुकेश ने उसे गले लगा लिया। दोनों कुछ पल तक यूँ ही लिपटे रहे। दूर सड़क पर ट्रेक्टर की आवाज़ आई तो दोनों अलग हो गए और नहाने धोने में जुट गए। नहाते-नहाते दोनों ने एक दुसरे के साथ पानी खूब खिलवाड़ किया। दोनों को एक दुसरे के भीगे, नंगे बदन का स्पर्श बहुत अच्छा लग रहा था। एक बार फिर दोनों की जवानी ने जोश मारा। सुकेश मयंक को नहर में और आगे ले गया। वहां नहर के इर्द गिर्द घने पेड़ और झाड़ियां थी।

दोनों के भीगे शरीर फिर एक हो गए। सुकेश ने मयंक को नहर के किनारे पत्थर पर हाथ टिका कर झुका दिया और खुद उसके पीछे उसकी कमर पकड़ कर खड़ा हो गया। मयंक ने अपना जांघिया नीचे खसकता महसूस किया, फिर अपनी जाँघों के बीच सुकेश के सख्त मांसल अंग को महसूस किया।

“सुकेश .. क्या कर रहे हो ..?” सुकेश ने कोइ जवाब नहीं दिया। सुबह के समय वैसे भी लड़कों में उत्तेजना ज्यादा होती है। वो मयंक के पिछले मुहाने की टोह लेता रहा।
“अह्ह्ह … !!!” मयंक की आह निकल गयी।

नहा -धो कर दोनों बाग़ में फिर से वापस आ गए, और भोजन के लिए रवाना हो गए। मयंक को अभी भी हल्का -हल्का दर्द हो रहा था।
दोनों चुप चाप चले जा रहे थे।
“मुझे वहां दर्द हो रहा है ” मयंक ने चुप्पी तोड़ी।
सुकेश ने उसके कन्धों पर अपनी बांह डाल दी।
“मेरी जान, थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा।”

खाना खा जब लौटे, तो उस छोटी सी कुटिया के एकांत में फिर से दोनों एक हो गए।
“अब तो दर्द नहीं हो रहा?” सुकेश ने पूछा।
“नहीं ” मयंक हल्का सा मुस्कुरा दिया।
सुकेश ने उसे चूम लिया।

सारी दोपहर दोनों जवानी के जोश में बहते रहे। हवस मर्द और औरत में भी फर्क नहीं करती।
मयंक को अगली बार दर्द कम हुआ।
अब उसे भी मज़ा आने लगा था।
दोनों के प्यार का सिलसिला थोड़ी देर के लिए थम गया जब सुकेश की भाभी खाना लेकर पहुंची, उसे सुबह घर पर न आने के लिए डाट डपट कर चली गयी।

सारी दोपहर, सारी शाम दोनों ने एक दुसरे की बाँहों में बितायी। आम के घने घने बागों से घिरी उस छोटी सी कुटी में दोनों का प्यार परवान चड़ने लगा।
फिर सुकेश रात के खाने का इंतज़ाम करने बाहर चला गया। जब लौटा, मयंक उससे बेल की तरह लिपट गया। उसके लिए सुकेश अँधेरे में दिए की तरह था। इस अनजाने, सुनसान गाँव अब वो उसका सबकुछ बन चुका था।

“मेरी जान …” सुकेश ने उसे गले लगा लिया “चलो खाना खा लो। फिर बियर पियेंगे ”
मयंक को अब उसकी हर बात अच्छी लगने लगी थी। हमेशा उसकी बात का मुस्कुरा कर जवाब देता था।

खाना खाने के बाद दोनों ने किंग ऑफ़ गुड टाइम्स की बियर से अपना टाइम गुड किया। फिर रात गहराई और दोनों ने सोने की तैयारी की।
लालटेन की रौशनी में दोनों खाट पर पसर गए। सुकेश बांह पर उचक कर मयंक को देखने लगा। मयंक भी उसे पलट कर देखने लगा। दोनों बियर के नशे में टुन्न थे।
सुकेश ने अपने होट नीचे करने शुरू किये और मयंक के पतले पतले होटों पर रख दिए। मयंक ने सुकेश को अपनी बाँहों के घेरे में ले लिया। सुकेश अब पूरा मयंक के ऊपर लेट गया। दोनों के होट अभी जुड़े हुए थे।

दोनों के शरीर की आग भड़क उठी। और इस बार कुछ ज्यादा ही। सुकेश चारपाई पर घुटनों के बल खड़ा हो गया और मयंक की टाँगे अपने कन्धों पर रख लीं। उसने अपने होटों से मयंक के होटों को ढक लिया। दोनों आसमान में ऊपर उठते चले गए, एक दुसरे से लिपटे। जब नीचे आये, दोनों एक दुसरे से उसी तरह लिपटे हुए सो गए। मयंक को ऐसा लगा जैसे सुकेश उसी के जिस्म का एक हिस्सा हो।

सुकेश को भी ऐसी अनुभूति पहले कभी नहीं हुई थी।

दोनों नींद में गुम, एक दुसरे से लिपटे सो रहे थे। न जाने कितने बजे रात को एक जोर की आवाज़ हुई। मयंक को लगा शायद लालटेन फट गयी हो- बुझाई जो नहीं थी। लेकिन उसने देखा देखा की सही सलामत लालटेन की मद्धम रौशनी में बंदूकें ताने, लगभग आधा दर्जन सिपाही अन्दर घुस आये थे। कुटिया का दरवाज़ा तोड़ दिया गया था।

फिर सबकुछ कुछ ही पलों में सिमट गया। सिपाहियों ने सुकेश को दबोचा और घसीट कर ले गए।
“मयंक … घबराओ नहीं। हम सी आर पी एफ के हैं। अब तुम सुरक्षित हो।” किसी की आवाज़ गूंजी। मयंक ये सब फटी आँखों से देख रहा था। मयंक को उसी समय सरकारी गेस्ट हॉउस में ले जाया गया और उसके बाद उसे उसके घर पहुंचा दिया गया।

उसके घर में जश्न का माहौल था। एक आध प्रेस वालों से भी उसकी मुलाकात हुई। उसके घर का ड्राइंग रूम खचाखच भरा हुआ था। उसका ध्यान टी वी पर गया

“छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री सुधाकर सिंह के बेटे मयंक को देर रात केंद्रीय रिज़र्व पुलिस ने छुड़ा लिया। उसे दुर्ग के दूर दराज़ गाँव में बंधक बनाकर रखा गया था। इस विशेष ऑपरेशन में तीन नक्सली मारे गए …”

मयंक का खून सूख गया। वो स्तब्ध सा टी वी देख रहा था, स्क्रीन पर कभी उसकी, उसके बाप की और कभी उस झोंपड़े की तस्वीर दिखाई जाती जिसमे उसे रखा गया था।

उसके दिमाग में बस सुकेश के अलावा और कुछ नहीं था। कहीं सी आर पी एफ़ ने सुकेश को तो … ?
मयंक को अभी भी भी सुकेश की बहुत याद आती है।

समाप्त

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