Gay sex story in Hindi font – ट्यूशन 1


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Gay sex story in Hindi font – ट्यूशन 1

मेरा नाम अनिल है. यह तब की कहानी है जब मैं अठारह साल का था.
दसवीं पास करने के बाद हम उसी स्कूल के जूनियर कॉलेज में पढ़ने लगे. वहां एक पति पत्नी पढ़ाते थे, चौधरी सर और मैडम. वैसे वे स्कूल में टीचर थे पर साथ साथ कॉलेज में भी लेक्चर लेते थे. वे ट्यूशन लेते थे पर गिने चुने स्टूडेंट्स की. वे पढ़ाते अच्छा थे और उनकी पर्सनालिटी भी एकदम मस्त थी, इसलिये कॉलेज में बड़े पॉपुलर थे.एक रिश्तेदार से उनके बारे में सुनकर उनकी ट्यूशन हमें नानी ने लगा दी थी. सर एकदम गोरे और ऊंचे पूरे थे. मैडम मझले कद की थीं और बड़ी नाजुक और खूबसूरत थीं. हमारी उमर ही ऐसी थी कि मैं और दीदी दोनों मन ही मन उन्हें चाहते थे.
जब एक दिन पढ़ने पहुंचे तो चौधरी सर बाहर गये थे. मैडम अकेली थीं.
दीदी ने पूछा “क्या हुआ मैडम?”

“अरे जरा दर्द है, कल शाम से ऐसा ही दुख रहा है. अभी ठीक हो जायेगा. लीना, जरा मालिश कर दे तू .और अनिल, तुझे बुरा तो नहीं लगेगा अगर मैं कहूं कि मेरे पैर दबा दे.”
मैं झट उठ कर खड़ा हो गया “हां मैडम, कर दूंगा, बुरा क्यों मानूंगा, ”
मैं साड़ी के ऊपर मैडम के पैर दबाने लगा.

अचानक उस कमरे का दरवाजा खुला और सर अंदर आ गये. दरवाजे पर खड़े होकर जोर से बोले “ये क्या चल रहा है?” लगता है वे एक दो मिनिट बाहर खड़े देख रहे होंगे कि अंदर क्या चल रहा है.
हम सपकपा गये और डर के उठ कर खड़े हो गये. मैडम शांत थीं. कपड़े ठीक करते हुए बोलीं “सर … कुछ नहीं, ये दोनों जरा मेरी मालिश कर रहे थे, आप जल्दी आ गये?”
“ऐसी होती है मालिश? मुझे नहीं लगा था कि ये ऐसे बदमाश हैं. इतने भोले भाले दिखते हैं. मैडम, मैं पहले ही कह रहा था कि इन कॉलेज के लड़कों लड़कियों की ट्यूशन के चक्कर में न पड़ें, ये बड़े बदमाश होते हैं. पर आप को तो तब बड़ा लाड़ आ रहा था.” फ़िर हमारी ओर मुड़कर बोले “आज दिखाता हूं तुम दोनों को, चलो मेरे कमरे में” कहकर वे मेरे और लीना के कान पकड़कर बाहर ले गये.

मैडम ने बोलने की कोशिश की “सर … उनका कोई कुसूर नहीं है … वो तो ..”
मैडम बोलीं “अब क्या करें इनका?”

“कुछ नहीं, माफ़ कर देते हैं. पर इन्हें काफ़ी कुछ सिखाने की जरूरत है. ऐसा करो तुम लीना को अपने कमरे में ले जाओ और जरा एक पाठ और पढ़ाओ. इनको संभालना, समझाना अब हमारी ड्यूटी है, कहीं बिगड़ गये तो …”

मैडम बोलीं ” अभी चल मेरे साथ उस कमरे में” और चौधरी सर की ओर मुस्कराते हुए वे लीना दीदी का हाथ पकड़कर ले गयीं. मैं भी पीछे हो लिया तो चौधरी सर मेरा हाथ पकड़कर बोले ’तू किधर जाता है बदमाश? ”

बाहर आते समय मैडम पीछे से फ़ुसफ़सा कर मुझे बोलीं “घबरा मत अनिल, सर गुस्से में हैं, माफ़ी मांग लेना तो शांत हो जायेंगे. जैसा वो कहें वैसे करना तो माफ़ कर देंगे, हं सख्त पर दिल के नरम हैं”

मैं घबराते हुए बोला “सर, मैं … अब क्या करूं?” वहां मैडम ने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया था.

“घबरा मत, इधर आ और बैठ” चौधरी सर ने सोफ़े पर बैठते हुए मुझे इशारा  डर लग रहा था पर एक अजीब से सनसनाहट भी हो रही थी दिमाग में. अंदाजा हो गया था कि अब क्या होगा, सर किस किस्म के आदमी थे, ये भी साफ़ हो चला था. पर कोई चारा नहीं था. जो कहेंगे वो करना ही पड़ेगा ये मालूम था.

मैं उनके पास बैठ गया तो उन्होंने मुझे कमर में हाथ डालकर पास खींच लिया. “अब बता, लीना की चूत देख कर मजा आया?”

“हां सर”

“आज तक सच में नहीं देखी थी?”

“नहीं सर, आपकी कसम. वो क्या है, दीदी चांस नहीं देती हाथ वाथ लगाने का”

“वैसे उसने नहीं तेरे को हाथ लगाने की कोशिश की? याने यहां? आखिर तू भी जवान है और वो भी” सर मेरे लंड को पैंट के ऊपर से सहलाते हुए बोले.

“नहीं सर, वैसे कई बार मेरा खड़ा रहता है घर में, उसे दिखता है तो टक लगाकर देखती है और मेरा मजाक उड़ाती है लीना दीदी”

अचानक सर ने मुझे खींच कर गोद में बिठा लिया.

“सर, ये क्या … ” मैं घबरा कर चिल्लाया.

“गोद में बैठ अनिल, स्टूडेंट भले सयाना हो जाये, टीचर के लिये छोटा ही रहता है”

बैठे बैठे मुझे उनके लंड का उभार अपने चूतड़ के नीचे महसूस हो रहा था. उन्होंने मुझे बांहों में भर लिया और मेरे बाल चूम लिये. फ़िर मेरा सिर अपनी ओर मोड़ते हुए बोले “अब तू चुम्मा देकर दिखा, लीना ने तो फ़र्स्ट क्लास दिखा दिया.”

“पर सर … मैं तो … मैं तो लड़का हूं” मैंने हकलाते हुए कहा.

“तो क्या हुआ! ऐसा कहां लिखा है कि लड़के लड़के चुम्मा नहीं ले सकते? वैसे तू इतना चिकना है कि लड़की ही है समझ ले मेरे लिये. अब नखरा न कर, लीना तो पास हो गयी अपने लेसन में, तुझे फ़ेल होना है क्या?”

मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी मर्द के साथ मैं इस तरह की हालत में होऊंगा. मैंने डरते डरते उनके होंठों पर होंठ रख दिये. उन्हें चूमते हुए चौधरी सर ने मेरी ज़िप खोल कर लंड बाहर निकाल लिया और उसे हाथ में लेकर पुचकारने लगे. लंड में इतनी मीठी गुदगुदी होने लगी कि धीरे धीरे मेरी सारी हिचकिचाहट और – ये कुछ गलत हो रहा है – ये एहसास पूरा मन से निकल गया. डर भी खतम हो गया. अब बचा था तो बस लंड में होती अजीब मीठी चाहत की फ़ीलिंग जिसके आगे दुनिया का कोई नियम नहीं टिकता.

पास से मैंने सर को देखा, वे सच में काफ़ी हैंडसम थे. बहुत देर बस सर चूम रहे थे और मैं चुप बैठा था पर आखिर मैंने भी उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया. उनके होंठ मांसल मांसल से थे, पास से सर ने लगाये आफ़्टर शेव की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी.

“मुंह बंद क्यों है तेरा? ठीक से किस करना हो तो मुंह खुला होना चाहिये, इससे किस करने वाले पास आते हैं और प्यार बढ़ता है” सर बोले. मैंने अपना मुंह खोला और सर ने भी अपने होंठ अलग अलग करके मेरे निचले होंठ को अपने होंठों में लिया और चूसने लगे. अब मुझे उनके मुंह का गीलापन महसूस हो रहा था, स्वाद भी आ रहा था.

“शाब्बास, अब ये बता कि तू जीभ नहीं लड़ाता अपनी दीदी से? ऐसे … जरा मुंह खोल तो बताता हूं. तेरी दीदी के साथ भी करने वाला था पर बेचारी बहुत शर्मा रही थी आज पहली बार … तूने सच में जीभ नहीं लड़ाई अब तक किसी से?” वे एक हाथ से मेरे लंड को और एक से मेरी जांघों को सहलाते हुए बोले.

“नहीं सर, अब तक नहीं … जब किस भी नहीं किया तो ये तो दूर की बात है”

“कोई बात नहीं, अब करके देख, जीभ बाहर निकाल” वे बोले. मैंने मुंह खोला और जीभ निकाली. सर ने अपनी जीभ भी मुंह से निकाली और मेरी जीभ से लड़ाने लगे. पहले मुझे अटपटा लगा पर फ़िर उनकी वो लाल लाल लंबी जीभ अच्छी लगने लगी. मैंने भी अपनी जीभ हिलाना शुरू कर दी. चौधरी सर ने सहसा उसे अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगे.
मुझे बहुत मजा आ रहा था. अब अपने आप मेरा बदन ऊपर नीचे होकर सर के हाथ की पकड़ मेरे लंड पर बढ़ाने की कोशिश कर रहा था. सर ने मेरी आंखों में झांकते हुए मुस्कराकर अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी और मैं उसे चूसने लगा. अब मैं भी मजे ले लेकर चूमा चाटी कर रहा था. चौधरी सर के मुंह का स्वाद मुझे अच्छा लग रहा था, जीभ एकदम गीली और रसीली थी. सर का लंड अब उनकी पैंट के नीचे से ही साइकिल के डंडे सा मेरी जांघों के बीच सट गया था और मुठिया मुठिया कर मुझे बार बार ऊपर उठा रहा था. मैं सोचने लगा कि कितना तगड़ा होगा सर का लंड जो मेरे वजन को भी आसानी से उठा रहा है.

दस मिनिट चूमा चाटी करके सर आखिर रुके “तेरे चुम्मे तो लीना से भी मीठे हैं अनिल. तुझे उससे ज्यादा मार्क मिले इस लेसन में. अब अगला लेसन करेंगे, जवानी के रस वाला. लीना का रस तो बड़ा मीठा था, अब तेरा कैसा है जरा दिखा”

मैं उनकी ओर देखने लगा. मेरी सांस तेज चल रही थी. लंड कस कर खड़ा था. मुझे नीचे सोफ़े पर बिठाते हुए सर बोले ’तू बैठ आराम से, देख मैं क्या करता हूं. सीख जरा, ये लेसन बड़ा इंपॉर्टेंट है”

सर मेरे सामने बैठ गये, फ़िर मेरे लंड को पास से देखने लगे. “मस्त है, काफ़ी रसीला लगता है” फ़िर जीभ से धीरे से मेरे सुपाड़े को गुदगुदाया. मैं सिहर उठा. सहन नहीं हो रहा था. “क्यों रे तुझे भी कैसा कैसा होता है लीना जैसे?” और फ़िर से मेरे सुपाड़े पर जीभ रगड़ने लगे.

“हां सर … प्लीज़ सर … मत कीजिये सर … मेरा मतलब है और कीजिये सर … अच्छा भी लगता है सर पर … सहन नहीं होता है” मैं बोला.

“अच्छा, अब बता, ये अच्छा लगता है?” कहकर उन्होंने मेरे लंड को ऊपर करके मेरे पेट से सटाया और उसकी पूरी निचली मांसल बाजू नीचे से ऊपर तक चाटने लगे. मुझे इतना मजा आया कि मैंने उनका सिर पकड़ लिया ’ओह .. ओह .. सर … बहुत मजा आता है”

“ये बात हुई ना, याद रखना इस बात को और अब देख, ये कैसा लगता है?” कहकर वे बीच बीच में जीभ की नोक से मेरे सुपाड़े के जरा नीचे दबाते और गुदगुदाने लगते. मैं दो मिनिट में झड़ने को आ गया. “सर … सर … आप … आप कितने अच्छे हैं सर …. ओह … ओह … ” और मेरा लंड उछलने लगा.

चौधरी सर मुस्कराये और बोले “लगता है रस निकलने वाला है तेरा. जल्दी निकल आता है अनिल, पूरा मजा भी नहीं लेने देता तू. यहां मार्क कम मिलेंगे तुझे. वो लीना भी ऐसी झड़ने ही की जल्दबाजी वाली थी. खैर तुमको भी क्या कहें, आखिर नौसिखिये हो तुम दोनों, सिखाना पड़ेगा तुम लोगों को और” कहकर उन्होंने मेरे लंड को पूरा मुंह में ले लिया और चूसने लगे. साथ ही वे मेरी जांघों को भी सहलाते जाते थे. चौधरी सर की जीभ अब मेरे लंड को नीचे से रगड़ रही थी और उनका तालू मेरे सुपाड़े से लगा था. मैंने कसमसा कर उनका सिर पकड़ा और अपने पेट पर दबा कर उचक उचक कर उनके मुंह में लंड पेलने लगा. सर कुछ नहीं बोले, बस चूसते रहे.

अगले ही पल मेरी हिचकी निकल गयी और मैं झड़ गया. मैंने सर का सिर पकड़कर हटाने की कोशिश की पर सर चूसते रहे, मेरे उबल उबल कर निकलते वीर्य को वे निगलते जा रहे थे. जब मेरा लंड आखिर शांत हुआ तो मैंने उनका सिर छोड़ा और पीछे सोफ़े पर टिक कर लस्त हो गया. सर अब भी मेरे लंड को चूसते रहे. फ़िर उसे मुंह से निकालकर हथेली में लेकर रगड़ने लगे. “तेरा रस बहुत मीठा है अनिल, लीना से भी, वैसे उसका भी एकदम मस्त है, तुझे फ़ुल मार्क इस टेस्ट में, तू बोल, तुझे मजा आया?”

“हां सर …. बहुत …. लगता था पागल हो जाऊंगा, सर … थैंक यू सर … इतना मजा कभी नहीं आया था जिंदगी में पर सर … वो मैंने आपका सिर हटाने की कोशिश तो की थी … आपने ही … सब मुंह में ले लिया …”

“क्या ले लिया?”

“यही सर … याने ये सफ़ेद …”

“ये जो सफ़ेद मलाई निकली तेरे लंड से, उसको क्या कहते हैं?”

“वीर्य कहते हैं सर” मैंने कहा.

“शाबास. तुझे मालूम है. वीर्य याने सच में जवानी का टॉनिक होता है, बेशकीमती, उसको कभी वेस्ट मत करना, जब जब हो सके, उसे मुंह में ही लेना, निगलने की कोशिश करना, सेहत के लिये मस्त होता है”
वे मेरे लंड से खेलते रहे. दोनों हाथों में लेकर बेलन से बेलते, कभी मुठ्ठी में लेकर दबाते और कभी अंगूठे और उंगली में लेकर मसलते “अब बोल, क्या कह रहा था तू कि लड़का है? तो लड़के याने मर्द आपस मजा नहीं कर सकते क्या ऐसे? तुझे मजा आया कि नहीं? मैं भी लड़का हूं, तू भी लड़का है, पर इससे कोई फ़रक पड़ा तेरी मस्ती में? बोल, कैसा लगा ये लेसन?”

“सर आप बहुत अच्छा सिखाते हैं” मैं उन्हें देखकर शरमाता हुआ बोला.

’और दिखने में कैसा लगता हूं? कि लड़का हूं इसलिये अच्छा नहीं लगता?” चौधरी सर ने मेरे लंड के सुपाड़े को चूमते हुए पूछा.

“नहीं सर, बहुत प्यारे लगते हैं, मैडम जैसे ही. कितने हैंडसम हैं आप” मैं अब हाथ को मेरी गोद में झुके उनके सिर के घने बालों में चला रहा था.

अब तक मेरे लंड में फ़िर गुदगुदी होने लगी थी और वह सिर उठाने लगा था. देख कर चौधरी सर ने उसे फ़िर मुंह में ले लिया और चूसने लगे. एक हाथ से वे अब मेरे पैर के तलवे में गुदगुदी कर रहे थे. मेरा जल्द ही पूरा खड़ा हो गया.

“तो ये पाठ पसंद आया तुझे?” चौधरी सर उठ कर सोफ़े पर बैठकर मुझे फ़िर बांहों में भरके बोले. अब मेरी हिम्मत बंध गयी थी. चौधरी सर ने जिस तरह से मेरा लंड चूसा था, मैं उनका गुलाम ही हो गया था. इसलिये अब बिना हिचकिचाहट मैंने खुद ही उनके होंठ चूम लिये. “हां सर, आप बहुत अच्छे हैं सर”

“तो अब चल, पाठ में जो सीखा, कर के बता. मेरे ऊपर कर” मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने अपने तंबू पर रखते हुए कहा.

मैं बिना शरमाये सर के तंबू पर हाथ फ़िराने लगा. मेरा दिल भी अब उनका लंड देखने का कर रहा था पर थोड़ा डर भी लग रहा था कि शायद चूसना पड़ेगा!

मेरे हाथ से मस्त होकर सर बोले “हां … बहुत अच्छे … और चलाओ हाथ अपना अनिल … लगता है ऐसा ही करते हो क्लास में क्यों? तभी तजुर्बा है लगता है … बदमाश कहीं के!”

दो मिनिट बाद सर बोले “अब ज़िप खोलो बेटे, मेरा लंड बाहर निकालो”

मैंने ज़िप खोली. अंदर सर ने जांघिया पहना था और लंड खड़ा हो कर अपने आप स्लिट से बाहर आ गया था. ज़िप खोलते ही पूरा टन्न से बाहर आ गया.

“बाप रे …” मेरे मुंह से निकल आया.

“क्या हुआ?” चौधरी सर मुस्करा रहे थे.

“बहुत बड़ा है सर, मुझे पता नहीं था कि किसीका इतना बड़ा होता है” सर के तन्ना कर खड़े लंड की ओर आंखें फ़ाड़ कर देखता हुआ मैं बोला.

“अच्छा लगा तुझे? ठीक से देख, हाथ में ले” सर बोले.

मैंने लंड हाथ में लिया.

“कैसा है, पूरा वर्णन करके बता”

“सर ऐसा लगता है जैसा गोरा मोटा मूसल है, गन्ने जैसा रसीला लगता है” मैं बोला.

“हां, और बोल” मस्त होकर सर बोले.

“सर नसें उभरी हुई हैं, एकदम मस्त दिखती हैं सर. और सर ये गोल गोल ….”

“इसे क्या कहते हैं बोल? मालूम होगा तुझे, अगर नहीं मालूम है तो एक तमाचा मारूंगा” सर मस्ती भरी आवाज में बोले.

“सुपाड़ा सर”

“ये हुई ना बात. तो बोल, कैसा है सुपाड़ा?”

“सर ….किसी टमाटर जैसा रसीला लग रहा है, लाल लाल फ़ूला हुआ. कभी रसीले सेब जैसा लगता है.”

“और ?”

“सर स्किन ऐसे तनी है जैसे हवा भरा गुब्बारा … कैसी मखमल सी लगती है ये गुलाबी स्किन …”

“चल अब ठीक से पकड़” चौधरी सर ने कहा. मैंने लंड को दो मुठ्ठियों में लिया, फ़िर भी पूरा नहीं आया, डंडे का दो इंच भाग और सुपाड़ा मेरी ऊपर की मुठ्ठी के बाहर निकले थे.

“सर बहुत बड़ा है सर, दो हथेली में भी पकड़ाई में नहीं आता है. सर …. नाप के देखूं?” मैंने उसुकता से पूछा
“बिलकुल देख. इसे कहते हैं असली स्टूडेंट! हर चीज की उत्सुकता होनी चाहिये. इस पाठ में तू अच्छा करेगा अनिल. जा, उस ड्रावर में से टेप ले आ”

मैं टेप ले आया.

“पहले खुद का नाप. बता कितना है?”

मैंने अकेले में कई बार नापा था फ़िर भी सर के सामने फ़िर से नापा. “सर, पांच इंच से ज्यादा है पर साढ़े पांच इंच के नीचे है”

“चल ठीक है, अब मेरा नाप. यहां नीचे से लगा, जड़ से और ऊपर तक ले जा. कितना है?”

“सर पौने आठ इंच है सर. ठहरिये सर फ़िर से देखता हूं” कहकर मैंने फ़िर टेप ठीक से लगायी “आठ इंच है सर! कितना बड़ा है!! इतना मोटा और लंबा!” मैं सुपाड़े को हथेली में भरकर बोला. “दूर से तो ऐसा लगता है जैसे फुट भर का हो”

“अब मोटाई देख. ऐसे नहीं मूरख, पाई सिखाया है ना तुझे? याद है ना? नहीं तो मारूंगा. टेप को डंडे में लपेट और देख. फ़िर मोटाई बता” सर ने कहा.

मैंने डंडे के चारों ओर टेप लपेटी. “सर सवा छह इंच के करीब है. याने ….”

“जल्दी बता …. सर्कमफ़्रेंस अगर साढ़े छह इंच है तो डायमीटर कितना है” मैं हिसाब लगाने लगा. “३.१४ से भाग करके …. कितना होगा …. ?” मैं बुदबुदाया. सिर चकराने लगा.

चौधरी सर ने मेरी पीठ में एक घूंसा मारा, हल्के से. “अरे मूरख, यहां क्या पेपर पेन्सिल लेकर गुणा भाग करेगा? पाई बराबर ३ समझ ले, अब बता”

“सर दो से जरा सा ज्यादा हुआ. याने आपका लंड दो इंच से थोड़ा ज्यादा मोटा है” मैं बोला.

“बहुत अच्छे. अब सुपाड़ा नाप” सर खुश होकर बोले. सुपाड़े के चारों ओर टेप लपेटी तो साढ़े सात इंच नाप आया. मैंने झट तीन से भागा” सर, अढ़ाई इंच के करीब है, बाप रे कितना मोटा है सुपाड़ा, लगता है जैसे आधे पाव का एक टमाटर हो” मेरे मुंह से निकल पड़ा.

“देखा ना, कैसा लगा सर का लंड अब बता?” सर बड़े गर्व से बोले. वे अब खुद ही अपने लंड को सहला रहे थे.

“सर बहुत …. बहुत …. मतवाला है सर. बहुत सुंदर, बहुत …. रसीला लगता है सर और कितना मजबूत और जानदार है सर”

“मान गया ना? अरे मेरा लंड ऐसा है कि किसी को भी स्वर्ग की सैर करवा दे, बस सैर करने वाला शौकीन होना चाहिये. रस चखेगा इसका? बोल?”

“हां सर, लगता है कि अभी चबा चबा कर खा जाऊं सर”

“तो शुरू हो जा. खेल उससे, उसे मस्त कर, स्वाद देख. याद है वह सब करना है जो मैंने किया था” सर पीछे टिक कर बैठते हुए बोले.
अगले दस मिनिट मैं चौधरी सर के लंड से खेलता रहा. उसे तरह तरह से हाथ में लिया, दबाया, रगड़ा, पुचकारा, अपने गाल और माथे पर रगड़ा. फ़िर सर के सामने जमीन पर बैठ कर चाटने लगा.

“आ ऽ ह ऽ … अब आया मजा मेरे बेटे. ऊपर से नीचे तक चाट! कुत्ते चाटते हैं ना वैसे, पूरी जीभ सटा के!” सर मस्त होकर बोले.

सर का लंड चाटने में बहुत मजा आ रहा था. पर मन सुपाड़े का स्वाद लेने को करता था. मैंने लंड को फ़िर से मुठ्ठी में पकड़ा और सुपाड़े की सतह पर जीभ फ़िराने लगा जैसे आइसक्रीम का कोन हो. एकदम मुलायम रेशमी चमड़ी थी, तनी हुई! लगता है कि मेरे नौसिखिये होने के बावजूद सर को मजा आ गया क्योंकि वे ऊपर नीचे होने लगे “हां …. हां बेटे … और चाट …. वो नोक पर छेद देखता है ना …. वहां जीभ लगा”

मैंने देखा कि सुपाड़े के बीचे के मूतने के छेद पर एक सफ़ेद मोती सा छलक आया था. “सर वहां तो ….” मैंने हिचकते हुए कहा.

“वहां क्या …. बोल …. बोल… क्या है वहां?” सर ने मेरे बाल पकड़कर कहा.

“सर वीर्य की बूंद है”

“अब उसका क्या करना है? बोलो बोलो अनिल … उसका क्या करना है?” उन्होंने कड़ी आवाज में पूछा. फ़िर खुद ही बोले “उसे चाटना है, स्वाद लेना है, अंदर के खजाने का कैसा जायका है यह आजमाना है. समझा ना?”

जवाब में मैंने हिचकते हुए उसे बूंद को जीभ से टीप लिया. खारा सा कसैला सा स्वाद था. मुझे अच्छा लगा. मैंने सुपाड़े का आधा हिस्सा मुंह में लिया और चूसने लगा. सर “ओह …ओह” करने लगे. फ़िर मेरे बाल खींच कर बोले “अरे मूरख दांत क्यों लगा रहा है? पर चल कोई बात नहीं, उससे भी मुझे मजा आ रहा है … हां …. हां …. ऐसे ही बेटे”

“सर … मुंह में ठीक से लेकर चूसूं सर?” मैंने पूछा. सर तो तैयार ही बैठे थे. मेरे कान पकड़कर बोले “तो और क्या कह रहा हूं मैं तब से नालायक लड़के?”

“सर … बहुत बड़ा है सर. मुंह में नहीं आयेगा” मैंने हिचकते हुए कहा.

“पूरा मुंह खोल, फ़िर आयेगा. मैं मदद करता हूं चल. पर पहले बता. मुंह में लेकर क्या करेगा?”

“सर चूसूंगा”

“कैसे चूसेगा?”

“सर कुल्फ़ी चूसते हैं वैसे चूसूंगा.”

“कब तक चूसेगा?” सर मेरे बाल सहलाते हुए बोले.

“जब तक आप झड़ नहीं जाते सर”

“झड़ने के बाद क्या करेगा? वीर्य थूक डालेगा, है ना? अच्छे बच्चे ऐसा ही करते हैं ना? बोल … जल्दी बोल!” सर ने मेरी आंखों में देख कर कहा.

“नहीं सर” हिचकिचाते हुए मैंने कहा “निगल जाऊंगा सर”

“क्या समझ कर? बोलो बोलो क्या समझ कर?”

मैं चुप रहा. समझ में नहीं आ रहा था क्या कहूं. सर ने फ़िर कड़ाई के स्वर में पूछा “बोलो अनिल. क्या समझकर निगलोगे अपने सर का वीर्य? कड़वी दवाई समझ कर?”

“नहीं सर.” मैं बोल पड़ा “आप का प्रसाद समझकर”

सर खुश हो गये. झुक कर मुझे चूम लिया “ये बोला ना अब ठीक से. अरे तेरे टीचर का प्रसाद है ये, बेशकीमती, मेरा शिष्य बनकर रहेगा तो बहुत ऐश करेगा. अब चल जल्दी मुंह खोल”

मैंने मुंह खोला. सर ने सुपाड़ा होंठों के बीच फ़िट कर दिया. फ़िर मेरे गाल पिचकाकर मेरा मुंह और खोला और सुपाड़ा अंदर सरका दिया. मेरे मुंह में सर का वो बड़ा सुपाड़ा पूरा भर गया. मैं आंखें बंद करके चूसने लगा. अब बहुत अच्छा लग रहा था. सुपाड़े में से बड़ी भीनी भीनी खुशबू आ रही थी. मैं जीभ से रगड़ रगड़ कर और तालू से सुपाड़े को चिपकाकर लड्डू जैसे चूसने लगा.
सर अब मेरे लाड़ करने लगे. कभी मेरे गाल पुचकारते, कभी मेरे बालों को प्यार से बिखराते पर अपने लंड को अब वे खुद नहीं छू रहे थे, हाथ दूर रखे थे. “हां …. हां अनिल बेटे …. बहुत अच्छे मेरे बच्चे …. तू तो बिना सिखाये ही फ़र्स्ट आ रहा है इस लेसन में …. तेरी परीक्षा है वो यह कि बिना मेरे हाथ लगाये … याने सिर्फ़ तू ही करेगा मेरे लंड से खेल … कितनी देर में तू मुझे दिलासा देता है …. तू कर लेगा अनिल…. कला है तुझमें …थोड़ा और निगल बेटे …. जरा और अंदर ले मेरा लंड …. हां ऐसे ही …. और …. और ले…तेरा मुंह तो मखमली है मेरे बेटे … क्या नरम नरम है … ओह … आह … बहुत प्यारा है तू अनिल …. हीरा है हीरा ….” सर का लंड और निगलने के चक्कर में मुझे खांसी आ गयी तो वे बोले “अब नहीं होता और तो रहने दे …. बाद में सिखा दूंगा …. अब जरा मेरे लंड को पकड़कर मुठ्ठ मार …. तेरा प्रसाद तेरे लिये तैयार है बेटे… निकाल ले उसे बाहर”

मैं सर के लंड के डंडे को पकड़कर मुठियाता हुआ उनकी मुठ्ठ मारने लगा. साथ ही मुंह में लिये सुपाड़े को और कस के तालू और जीभ में दबाया और चूसने लगा. सर ऊपर नीचे होने लगे, मेरे मुंह को अपने लंड से चोदने की कोशिश करने लगे. मैं लगातार मुठ्ठी ऊपर नीचे करके उनको हस्तमैथुन करा रहा था.

“ओह ऽ.. हां ऽ मेरे राजा ऽ … आह ऽ ” करके सर ने मेरे सिर को पकड़ लिया. उनका लंड अब उछल उछल कर झड़ने लगा था. मेरे मुंह में गरम गरम चिपचिपे वीर्य की फ़ुहार निकल पड़ी. मैं आंखें बंद करके पीता रहा. अब मेरा सारा परहेज खतम हो गया था. मजा आ रहा था. सर को ऐसे मीठा तड़पा दिया यह सोच कर गर्व सा लग रहा था. चिपचिपा वीर्य मेरे तालू से चिपक गया था पर ऐसा लग रहा था जैसे थोड़ा नमक मिली जरा सी कसैली मलाई हो. चार पांच बड़े चम्मच जितना वीर्य निकला सर के लंड से, मैं सब निगल गया. सोच रहा था कि कटोरी भर होता तो और मजा आता.

आखिर सर ने मेरे मुंह से लंड निकाला. मुझे ऊपर खींच कर गोद में ले लिया और एक गहरा चुंबन लेकर बोले “बहुत अच्छे अनिल, तू तो अव्वल नंबर है इस लेसन में. वैसे इस लेसन के और भी भाग हैं, वो मैं तुझे सिखा दूंगा. पर आज जो तूने किया उसके लिये शाब्बास बेटे. अब बता, स्वाद आया? मजा आया?” मैंने पलकें झपकाकर हां कहा क्योंकि मैं अब भी चटखारे ले लेकर जीभ से लिपटे चिपचिपे कतरों का स्वाद ले रहा था

मुझे अच्छा भी लग रहा था सर के मुंहसे तारीफ़ सुनकर. मेरा लंड भी अब मस्त खड़ा था. डर भी निकल गया था इसलिये मैं उनकी गोद में उनकी ओर मुड़ कर बैठ गया और शर्ट के ऊपर से ही उनके पेट पर लंड रगड़ने लगा. चूमाचाटी चलती रही. सर अब बड़ी प्यार भरी आंखों से मेरी ओर देख रहे थे. मैंने सर का लंड अब भी कस कर हाथ में पकड रखा था. वह धीरे धीरे फ़िर से लंबा होने लगा.

कुछ देर बाद वे उठे और बोले “चलो, अब जरा देखते हैं कि तेरी दीदी का पाठ खतम हुआ कि नहीं. वैसे ये बता कि मजा आया? … याने प्रसाद कैसा लगा? स्वाद आया या नहीं?”

“अच्छा लग रहा था सर. कितना चिपचिपा था? चिपकता था तालू में! खारा खारा सा है सर … जैसे मलाई में नमक मिला दिया हो. सर …. एक बात पूछूं सर?” मैंने उनके पीछे चलते हुए कहा. वे मेरे लंड को लगाम सा पकड़ कर खींचते हुए मुझे दूसरे कमरे में ले जा रहे थे.

“सर अब कल से …. याने फ़िर से आप … मतलब सर ….” मैं थोड़ा शरमा गया.

“बोलो बोलो अब डरने की कोई बात नहीं है, तुम दोनों ने साबित कर दिया है कि कितने अच्छे स्टूडेंट हो. अब मैडम और मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है … हां ऐसे ही कहा मानना पड़ेगा अब रोज. बोलो तुम क्या पूछ रहे थे?”

“सर अब रोज ऐसे ही … याने ऐसे ही लेसन होंगे क्या?” मैंने पूछा.

“हां होंगे तो? पसंद नहीं आये?” सर ने पूछा.

“नहीं सर, अच्छे लगे, बहुत मजा आया. इसलिये पूछ रहा था”

“चलो, बहुत अच्छा हुआ. अब बच्चो, आज की तुम्हारी गलती माफ़ की जाती है. अब घर जाओ, देर हो गयी है. पर अब ऐसे लेसन रोज होंगे. तुम्हें ठीक से सिखाना पड़ेगा. दोनों अच्छे होनहार हो और बहुत प्यारे हो, जल्दी ही सब सीख जाओगे. अब कल से घर में बता कर आना कि सर और मैडम रोज एक घंटे की नहीं, तीन घंटे की ट्यूशन लेने वाले हैं. तुम्हारा स्कूल तीन बजे छूटता है ना?” सर ने पूछा. हमने मुंडी हिलायी.

दूसरे दिन हम जल्दी पहुंच गये.

“आओ बच्चो, दस मिनिट जल्दी ही आ गये?” सर ने दरवाजा हमारे पीछे बंद करते हुए पूछा.

“हां सर, सोचा देर न हो जाये” मैं नीचे देखता हुआ बोला.

“बहुत अच्छा किया. ज्यादा टाइम मिलेगा हमें, है ना? लो ये मैडम भी आ गयीं” सर ने कहा. वे सिर्फ़ कुरता पजामा पहने हुए थे. लगता है अंदर और कुछ नहीं था क्योंकि हम दोनों को देखते ही उनके पाजामे में धीरे धीरे एक तंबू बनने लगा.
वे टेबल के पीछे बैठे थे, शायद जान बूझकर जिससे हमें उनका तंबू न दिखे और मन इधर उधर न भटके. शायद उन्होंने मैडम की बात सुन ली थी. हम इंग्लिश पढ़ने लगे. सर ने मन लगाकर पढ़ाया. बीच बीच में पूछते जाते. दीदी अब फ़टाफ़ट जवाब दे रही थी. पर मेरा ध्यान बार बार सर पर जाता. वे सच में काफ़ी हैंडसम थे, शेव किया हुआ उनका चेहरा एकदम चिकना लग रहा था. मैं बार बार कल के बारे में सोच रहा था, सर का लंड याद आ रहा था.
. फ़िर सर ने. सर का लेसन खतम होने पर मैं उठ कर जाने लगा तो सर बोले “कहां जा रहा है तू अनिल?”

मैं सकुचा कर बोला “सर … मैडम के पास ….”

“अरे आज तेरी बारी है मुझसे लेसन लेने की. आज लीना जायेगी मैडम के पास. तू जा लीना, मैडम राह देख रही होंगी” और सर ने मुझे हाथ पकड़कर अपनी गोद में खींच लिया.
मेरा दिल धड़कने लगा. सर मेरे साथ क्या करेंगे? पर लंड भी खड़ा होने लगा. परसों सर के साथ क्या मजा आया था उनका लंड चूस कर, यह याद आ रहा था.

चौधरी सर कपड़े उतारने लगे. मैं अभी भी सकुचाता हुआ वैसे ही खड़ा था. सर बोले “चल नंगा हो जा फटाफट. अब हम ये लेसन आराम से सलीके से करते हैं ये तूने देखा ना कल?”

“हां सर” मैं धीरे से बोला.

“फ़िर निकाल कपड़े जल्दी.  आज और मजा आयेगा. मैं मदद करूं नंगा होने में?”

“नहीं सर …” कहकर मैंने भी सब कपड़े उतार दिये.

चौधरी सर का लंड मस्त खड़ा था. लंड पकड़कर सहलाते हुए वे सोफ़े में बैठे और मुझे हाथ से पकड़कर खींचा और गोद में बिठा लिया. मुझे कस के चूमा और बोले. “पहले खूब चुम्मे दे अनिल. परसों तेरे चुम्मे बड़े मीठे थे पर जल्दी जल्दी में मजा नहीं आया. आज प्यार से अपने सर को चुम्मे दे, तुझे अच्छे लगते हैं ना? ”

मैंने शरमाते हुए मुंडी हिलाई और सिर सर की ओर घुमाकर सर के होंठ चूमने लगा. सर का लंड मेरी पीठ पर धक्के मार रहा था. सर ने मेरे लंड को मुठ्ठी में लिया और मस्त करने लगे. उनकी जीभ मेरे मुंह में घुस गयी थी. मैं उसे चूसने लगा और कमर उचकाकर लंड उनकी मुठ्ठी में अंदर बाहर करने लगा. सर की जीभ मेरे गले में घुस गयी. मुझे थोड़ी खांसी आयी पर सर ने मेरा मुंह अपने मुंह से बंद कर दिया था, इसलिये उनके मुंह में ही दब के रह गयी. सर अब मेरी आंखों में झांक रहे थे.

सर ने खूब देर सता सता कर मेरा मुंह चूसा और अपना चुसवाया. पांच दस मिनिट में मेरी सारी झेंप खतम हो गयी थी. लंड सन सन कर रहा था और सर का हाथ उसपर अपना जादू चला रहा था. मुझे अब सर पर इतना लाड़ आ रहा था कि मैं जब भी मौका मिलता प्यार से उनके गाल, आंखें और कान चूमने लगता. कभी गले पे मुंह जमा देता पर सर फ़िर से मेरे होंठ अपने होंठों में लेकर दबा लेते और चूसने लगते.

मेरी हालत खराब हो गयी. इतना मजा आ रहा था कि सहा नहीं जा रहा था. सोच रहा था कि सर फ़िर से परसों जैसा चूस लें तो क्या लुत्फ़ आयेगा. या अपना मस्त लौड़ा मुझे चुसवा दें. जो भी हो, कुछ तो करम करें मेरे ऊपर. आखिर मैं बोल पड़ा “सर …. सर …. प्लीज़ … सर”

“क्या हुआ अनिल? बोलो बेटे, मजा नहीं आ रहा है?” सर ने शैतानी से पूछा. “शरमाओ नहीं, अब घबराओ भी मत, अपने मन की बात कह दो. मैं भी आज तुझसे अपने मन जैसा करने वाला हूं”

“बहुत मजा आ रहा है सर … रहा नहीं जाता … प्लीज़ सर …” मैंने अपना हाथ अपनी पीठ के पीछे करके सर के मूसल को पकड़कर कहा “सर… अब चुसवाइये ना प्लीज़”

“अरे वाह, आखिर तूने अपने मन की कह ही दी. अरे ऐसे ही खुल कर बोला कर, सेक्स में शरमारे नहीं. तुझे स्वाद पसंद आया उस दिन लगता है. उसे दिन मजा आया था?”

“हां सर, बहुत जायकेदार था”

“चलो, अभी चुसवाता हूं. पर पूरा लेकर चूसना पड़ेगा. ”

कहकर सर बिस्तर पर लेट गये और मुझे अपने सामने लिटा कर लंड मेरे चेहरे पर रगड़ने लगे. लंड मस्त खड़ा था, गुलाबी लाल सुपाड़ा तो क्या रसीला था. उसमें सर के मद की धीमी धीमी खुशबू आ रही थी. मैंने मुंह बाया और सुपाड़ा मुंह में लेकर चूसने लगा. परसों जैसे मैंने सर का लंड पकड़ा और आगे पीछे करने लगा.

“ऐसे तो तू फ़ेल हो जायेगा. ये क्या नर्सरी के बच्चे जैसा लेसन ले रहा है. अब आगे का लेसन है, प्राइमरी का. पूरा मुंह में ले, चल फ़टाफ़ट. आज सिर्फ़ लड्डू खाकर नहीं छुटकारा होगा तेरा, पूरी डिश खाना पड़ेगी” सर ने मेरे बालों में उंगलियां चलाते हुए कहा.

मैंने उत्साह से मुंह खोला और निगलने लगा. चार पांच इंच निगला और फ़िर सुपाड़ा गले में फ़ंस गया. सर ने मेरा सिर पकड़कर अपने पेट पर दबाया. मेरा दम घुटने लगा और मुझे खांसी आ गयी. सर ने एक दो बार और दबाया, फ़िर छोड़ दिया. “अरे अनिल बेटे, आज तू फ़ेल हो जायेगा पक्का. चल फ़िर से कोशिश कर”

मैंने तीन चार बार कोशिश की पर सर का मतवाला लौड़ा हलक से नीचे नहीं उतरता था, फ़ंस जाता था. मैंने आंखें उठा कर सर की ओर देखा कि सर, अब क्या करूं?

सर ने मेरे मुंह से लंड निकाला. मेरे कान पकड़कर बोले “क्यों रे नालायक? इतना भी नहीं कर सकता? और डींग मार रहा था कि सर आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. ”

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