Hindi Gay sex story – गे रेप स्टोरी – ३


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और फिर बातें हुई और उसने अपने पहले छोटे से रेप की कहानी सुनाई।

उनका आठवीं तक स्कूल तो उनके कस्बे में ही था। पर जब वो 13-14 साल का हुआ और नौंवीं कक्षा में पहुँचा, तब शहर के स्कूल जाने लगा। बस चलती थी लेकिन अनियमित थी और बहुत भरी रहती थी। टेम्पो भी ऐसे ही भरे हुए जगह-जगह रुकते, भट-भट करके चलते थे और ये सब किराया लेते थे, और बच्चों का जैसा रहता था कि किराए के पैसे बचा के कुछ खा पी लो, तो ये और इसके दोस्त अक़्सर शहर के स्कूल और कस्बे के बीच जा रहे किसी वाहन से लिफ़्ट ले लेते थे, कोई ट्रैक्टर, टॉली, कोई जीप, या कोई ट्रक।

उस दिन भी दिन का क़रीब दो बजा होगा, और स्कूल के बाद अनिल और उसके चार दोस्त एक ट्रक में लिफ़्ट लेकर कस्बे वापस जा रहे थे। ड्राइवर क्लीनर आगे केबिन में बैठे थे, पीछे ट्रक शायद रेत बजरी को डाल के आ रहा था और खाली था, चारों तरफ़ आधी दीवारें बनी थीं और ये पाँचों पीछे वहीं बैठे थे।

रास्ते में एक एक जगह पर एक गाँव के एक सिरे पर एक कुँवा पड़ता था और सड़क उसके सामने से जाती थी। उस कुँवें पर उस दिन सात आठ जवान औरतें कपड़े धो रही थीं, नहा रही थीं। ये सब 13-14-15 साल के रहे होंगे, नई जवानी थी, सेक्स और औरतें समझ में आने लगी थीं। बाकी चारों की नज़रें उन औरतों के अधखुले भीगे जिस्मों पर चिपक गई। दिखने में तो छोटे ही थे, इसलिए औरतों ने भी कोई ऐतराज़ नहीं लिया, वरना कोई बड़ी उमर का लड़का या आदमी ऐसे देखता था तो औरतें वहीं से गालियाँ देती थी, पत्थर तक फेंक के मार देती थीं। तो बाकी चारों उन औरतों को ताक रहे थे और उनके नए बढ़े लंड उनकी नेकरों पैंटों में टन्ना गए।

कुछ औरतों ने देखा तो शायद समझा कि ये बचपन की जिज्ञासा नहीं है बल्कि जवानी की भूख है, और फिर उनमें से कुछ औरतों ने भी इनके मज़े लेने शुरु कर दिए। किसी ने बाल्टी से अपने जिस्म पर पानी उडेला। कोई अपनी साड़ी उतार के पेटीकोट में ही बैठ गई। किसी ने अपने स्तनों को पूरा खोल दिया और रगड़ने लगी, किसी ने अपनी साड़ी पेटीकोट को एकदम जाँघों तक उठा दिया और साबुन लगाने लगी। इन लड़कों को तो उनकी चूत तक दिख गई या जो भी दिखा होगा उसको इन्होंने उनकी चूतें समझ लिया। ट्रक में आधी दीवारें थीं। इनके सिर्फ़ सिर ही ट्रक से बाहर दिख रहे थे, बाकी बदन नीचे ट्रक में छुपा था, ये सब पाँव फैला के बैठे थे जिसमें से इन सबकी पैंटों पर खड़े लंड से बने तंबू एक दूसरे को साफ़ दिख रहे थे। और फिर इन पाँचों में से सबसे बिंदास लड़के ने लाज-शर्म को तलाक़ दे कर अपना लंड अपनी पैंट से बाहर निकाला और ट्रक में ही मुट्ठ मारने लगा, उन औरतों को देखकर। उसकी देखा देखी बाकी तीन ने भी अपने अपने लंड खोले और वहीं पर मुट्ठ मारने लगे। ट्रक से बाहर कुछ नहीं दिख रहा था कि गर्दन के नीचे क्या चल रहा था।

लेकिन शायद सर के हिलने, चेहरे के भावों से ही उन औरतों ने समझ लिया कि ये लड़के क्या कर रहे हैं, वो एक दूसरे को देख कर हँसी, किसी ने कुछ कहा जो यहाँ तक सुनाई नहीं दिया। और फिर तो सबने क़हक़हे लगाए। और फिर वो तो इन लड़कों के मुट्ठ मारने में मदद करने के लिए बाक़ायदा पोज़ देने लगीं। अपने जिस्मों को और उघाड़ कर, स्तनों को धोने के नाम पर मरोड़ कर, चूचियों को दबा कर, जाँधों को धो कर, चूतें दिखा कर। और कुछ ही देर में चारों लड़कों का माल निकलने लगा। अब जब आप और हम मुट्ठ मारते हैं तो नियंत्रण बनाए रहते हैं, ख़ामोश रह लेते हैं, लेकिन शायद आपको नहीं मालूम हो कि नई जवानी में जब 13-14 साल के लड़के मुट्ठ मारते हैं तो सेक्स के ज्वार में अपने पर बिल्कुल नियंत्रण नहीं कर पाते हैं और उनकी आहें कराहें सिसकारियाँ निकलने लगती हैं, और माल निकलते समय तो जैसे चीखने ही लगते हैं। या कुछ कमेंट्री तो देते ही हैं जैसे किसी को बिस्तर में चोद रहे हों, “ले ले” “ये ले”, “आआआह”। केबिन वाले ड्राइवर और क्लीनर ने ट्रक की आवाज़ में या तो सुना नहीं होगा, या सुना भी होगा तो लड़के आपस में बाते कर रहे हैं सोच के ध्यान नहीं दिया।

सबके धार पे धार निकले जो नीचे पड़ी बाकी रेत में जज़्ब हो गए। और फिर सबके ज्वार का भाटा आया। भारी साँसे ठीक हुई, और फिर सबने अपने लंडों से चिपकी बूँदों को पोछ कर लंड को पैंट में भरा और पैंट बंद की, कपड़े ठीक किए। जहाँ माल टपका था, वहा और रेत डाल कर उसको ढक दिया। कोई निशानी बाकी नहीं थी। ट्रक दूर निकल आया था।

ये समूह मुट्ठ-मारी-करण बाकी चार लड़कों ने किया था, अपने अनिल ने नहीं किया था। फिर अनिल क्या कर रहा था इस बीच? वो अपने दोस्तों पर गुस्सा हो रहा था, उनकी गंदी हरक़त पर बड़बड़ा रहा था, उनको बुरा-भला, नहीं, बुरा-बुरा कह रहा था, उन पर लानतें भेज रहा था। अनिल पढ़ने में हमेशा से अच्छा था इसलिए क़स्बे में उसका बहुत सम्मान था। वैसे तो उसमें कोई बुराई थी नहीं, लेकिन फिर भी अगर कोई किसी भी बात पर अनिल की शिक़ायत करता था, तो अनिल को कुछ नहीं बोला जाता था, उल्टे उस शिक़ायत करने वाले को ही डाँट पड़ती थी, मार तक पड़ती थी। जबकि अनिल किसी के बारे में एक शब्द भी बोल दे तो उस लड़के की उसके घरवाले तुड़ाई कर देते थे। इसलिए सारे लड़के अनिल से अच्छी दोस्ती बना कर उसे ख़ुश रखते थे। और वैसे भी अनिल का बाकी व्यवहार भी अच्छा था। अनिल किसी भी “गंदी” हरक़त में नहीं था। उसके सामने कोई सेक्स की गंदी बातें भी नहीं कर सकता था, गालियाँ तक नहीं दे सकता था। इसलिए अनिल को मालूम तक नहीं था कि ये सब क्या हो रहा है, मुट्ठ मारना क्या होता है, सेक्स क्या होता है। उसने बाकी लड़कों के लंड पहली बार देखे थे।

और अनिल ने इस बीच ख़ुद नहीं कुछ किया था। वैसे कनखियों से औरतों के नंगे जिस्मों को कनखियों से देखने का लोभ वो नहीं रोक पाया था, और उसका ख़ुद का लंड भी खड़ा हो गया था, जिसको वो छुपा कर बैठा था, और वो इन सबको ये गंदा काम बंद करने को कहता जा रहा था। घर पर बता देने की धमकियाँ दे रहा था, जिनका खड़े लंडों पर क्या असर होना था। लेकिन जब सबका माल निकल गया, और सब अपने लंड पैंट बंद करके फिर से होश में आए थे, और अनिल का हिक़ारत भरा बड़बड़ाना, बता दूँगा, मार पिटवाऊँगा की धमकियाँ देना नॉन-स्टॉप चालू रहा तो लड़कों को ग़ुस्सा भी आया और डर भी लगा। किसी ने उसको समझाने की क़ोशिश की ये सब चलता रहता है, तो अनिल का ग़ुस्सा और बढ़ गया, और धमकियों की तीव्रता और बढ़ गई।

और फिर उन लड़कों में से किसी के सब्र का बाँध टूटा और उस पहलवान लड़के ने अनिल को जकड़ के ट्रक में लिटा लिया, साथियों को हुक़्म दिया “पकड़ साले को।“ और बाकी तीनों ने पहले से दुबले-पतले अनिल को जकड़ के ट्रक में सपाट लिटा दिया कि उसका अब तक खड़े लंड से बना तंबू साफ़ दिखने लगा। अनिल ने चिल्लाने की कोशिश की तो उस पहलवान ने उसका मुँह ज़ोर से बंद कर दिया। वो बोला “साले ख़ुद का लंड खड़ा है, हमको अकल बाँटता है।“ अनिल झटपटा रहा था लेकिन कोई रास्ता नहीं था दुबले पतले अनिल का उन चारों की जकड़ से निकलने का। पहलवान लड़के ने फ़िर फ़रमान जारी किया “नंगा कर साले को।” और बाकी तीनों ने सेकंड भर में अनिल की बेल्ट खोल दी, पैंट के बटन जिप खोल दी, पैंट और भूरी लेग्ज़ वाली बॉक्सर चड्ढी को खिसका के घुटने के नीचे कर दिया। अनिल का टन्नाया 3 इंच का पेंसिल जितना पतला लंड नंगा खड़ा था, और छूटे हुए प्रीकम को टपका रहा था। अनिल “घूँ घूँ” करके गुस्से में छूटने की क़ोशिश कर रहा था और उसकी “घूँ घूँ” करके धमकियाँ बढ़ती जा रही थीं।

अब वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं था उन लड़कों के लिए। अगर इसने शिक़ायत की तो अब तो ज़बरदस्त मार पड़ेगी सबको। इसलिए सोचा की इसको भी डुबा लो। और फिर पहलवान ने हुक़्म दिया “हिला साले का।“ और तीन जोड़ी हाथ अनिल के कुँवारे अनछुए बदन पर घूमने लगे, उसको गरम करने लगे, उसके सीने, निपल बगल, पेट, नाभी, जाँघों, अँडवों, रानों, कूल्हों, गाँड को दबाने, मसलने, मरोड़ने लगे। और मिल जुल के अनिल के लंड को हिलाने लगे।

जिस्म का अपना तरीका होता है, चार जोड़ी हाथ मज़े दे रहे हों, तो मज़ा तो मर्ज़ी के बिना भी आया ही, और फिर अनिल ने जिसने कभी मुट्ठ नहीं मारा था, जिसने अपने खड़े लंड तक को कभी छुआ नहीं था, जिसका कभी नाइटफ़ॉल नहीं हुआ था, जिसको मालूम तक नहीं था कि ये सब होता क्या है, उस अनिल का प्रेशर बना, उसका छूटने के लिए तड़पना, मस्ती पाने के कसमसाने में बदलना, उसकी आहें, कराहें, सिसकारियाँ निकलीं, और उसका पहली बार माल निकला और उसके अपने नंगे जिस्म पर फैल गया। वो आह, आह, आह कर रहा था, अपने नितंबों को झटके दे कर उन लड़कों के हाथों को किसी की चूत जैसा समझ कर हवा में उनको चोदने के लिए ठसके मार रहा था। मस्ती की बाढ़ में अनिल के आँसू तक निकल आए।

कुछ बूँदें छोड़ने के बाद अनिल का निकलना बंद हुआ, उसका बदन ढीला पड़ गया। लड़कों ने उसके बदन पर कुछ और हाथ फेर के उसको ठंडा किया, उसके लंड पर चिपकी बूँदों को और उसके जिस्म पर बिखरे माल को पोछा, और फिर उसके लंड, चड्ढी, पैंट को बंद करके उसके कपड़े ठीक किए और वो अलग हो गए। अनिल बैठ गया।

ट्रक चला जा रहा था। बाहर से किसी को कुछ नहीं दिखा होगा, या दिखा भी होगा तो ऐसा किसी ने ध्यान नहीं दिया। लड़कों ने कर तो लिया लेकिन उनकी फट रही थी कि अब तो अनिल बहुत ग़ुस्सा होगा, लेकिन फिर भी बिंदास बनकर पहलवान ने अनिल पर इल्ज़ाम जैसा लगाया, बोला “मज़ा आया।“

और अनिल ने पाया कि उसका सिर बिना उसके सोचे, बिना उसके चाहे हाँ में हिल गया कि मज़ा आया। अनिल की आँखे किसी के चेहरे पर पड़ती थीं फिर भी उसको देख नहीं रही थीं, जैसे कि वो किसी सपने में डुबा हुआ हो, जैसे नींद में चलना होता है। फिर अनिल को लगा कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। इन लड़कों को सज़ा मिलनी चाहिए, उसको ग़ुस्सा करना चाहिए। लेकिन बहुत क़ोशिश करने के बाद भी अनिल ने पाया कि उसको ग़ुस्सा नहीं आ रहा है, उसके ध्यान में और कुछ आ ही नहीं पा रहा था, उसका ध्यान मस्ती की उस पेंग को अभी भी झूल रहा था जो उसके कुँवारे, अनछुए तन-मन को पहली बार मिली थी, और क्या ज़बर दस्त तरीक़े से मिली थी। उसकी आँखे अभी भी बार बार बंद हो जा रही थीं। उसकी अभी भी कभी कभी कराह या मस्ती सिसकी निकल जा रही थी। उससे बोला नहीं जा रहा था। उसने पाया कि वो लेटना चाहता है, सोना चाहता है, सपने देखना चाहता है कि चार लड़के उसका ज़बरदस्ती मुट्ठ मार रहे हैं, जबकि उसको तब तक मालूम भी नहीं था कि इसको मुट्ठ मारना कहते हैं, उसको मालूम नहीं था कि जो निकला उसको क्या कहते हैं।

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