Hindi Gay sex story – ख़ुशनुमा यादें


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Hindi Gay sex story – ख़ुशनुमा यादें

फिर आ के बैठे, चाय नाश्ता हुआ। फ़िल्मों की सीडी ले कर आए, देखीं। दिन में जा के लंच लिया। शाम तक मैंने उनका कुछ और बार चूसा। इस बार उन दोनों ने भी मेरा लंड हिला कर मेरा माल निकाला। फिर वो चले गए।

वो बहुत-बहुत दिनों में आते और हर बार मैं और अनिल एक-एक बार भूपेन की गाँड मारते और मैं दोनों के लंड चूसता, वो मेरा हिलाते।

जब भूपेन बाथरूम वगैरह गया होता, उतनी देर में अनिल से कुछ पर्सनल बातें हो जाती थीं। मैंने पूछा “रूम पर भी करते हो क्या।“ तो उसने बताया कि “हाँ, भूपेन का कभी-कभी मूड होता है, तो वो खुद ही मरवाने की पोज़ीशन में आ जाता है, और मैं उसके कर देता हूँ।“ मैंने कहा “तू भी करवा ले उससे। क्या मस्त लंड है उसका। मज़ा आ जाएगा।“ उसने कुछ नहीं कहा।

उनका आना और कम होता रहा, और फिर तो रुक ही गया, मतलब कि वो बहुत दिन तक नहीं आए।

लेकिन फ़िर करीब एक साल बाद अनिल का एक दिन अचानक फ़ोन आया। उसने कहा कि उसके गाँव के एक दोस्त की शादी थी और बरात यहाँ आई हुई थी, और उसके सारे दोस्त आए थे, और कुछ दोस्त बी पी देखने को कह रहे थे। तो उसने पूछा कि क्या वो उनको मेरे यहाँ ला सकता था। और किसी को तो वो जानता नहीं था, साइबर में तो ऐसे ग्रुप में बीपी देखना ठीक नहीं लगता।

नेकी और पूछ-पूछ। मैंने चाहा कि पूछूँ कि सेक्सी होंगे तेरे दोस्त तो नंगा कर दूँगा मैं, चूस लूँगा उनके। लेकिन मैंने सोचा पहले से अपने इरादे बता के उसको भगाने से कोई फ़ायदा नहीं है। वैसे भी वो मेरी आदतें जानता था तो कुछ सोचा होगा उसने, या फिर इतने ज़्यादा लोगों में कुछ नहीं हो पाना था। मैंने बुला लिया।

वो आए। तीन दोस्त और अनिल। अनिल की बढ़ने की उम्र शायद निकल चुकी थी। बदन भारी होने लगा था जो उसके हड्डियों के कंकाल जैसे बदन से बहुत अच्छा लग रहा था। चेहरे की मासूमियत जा चुकी थी और बुद्धिमानी और आत्मविश्वास झलक रहा था। बहुत अच्छा लगा उसका विकास देख कर। और उसके तीनों दोस्त तो एक से एक मस्त, बिंदास, अनछुवे, कुँवारे, बातूनी, गाली-गलौज करने वाले। बारात के लिए सभी चिकने होकर बन-ठन के आए थे, तो जल्वों में चार-चाँद लगे हुए थे। वो बियर का पूरा क्रेट उठा लाए थे, और सिगरेट के पैकेट और स्नैक्स भी। दारू की बात तो अनिल ने नहीं की थी, लेकिन क्या जाता था। पता चला कि अनिल भी सिगरेट और बियर शुरु कर चुका है। बी पी चली। हम सब सिगरेट, बियर, नाश्ते में डूब गए। हँसी मज़ाक़, गाली-गलौज़, उनका एक-दूसरे की पोल खोलना जारी था।

मैं तड़प रहा था कि उनमें से कोई अकेला मिले तो उसको छुँवूँ, पटाऊँ, नंगा करूँ। लेकिन कोई बहाना, तरीक़ा सूझ नहीं रहा था कि तीन को कहीं भेज के एक को अकेला करूँ। लेकिन क़िस्मत मेहरबान थी। मस्त माहौल में दारू, बीपी से उनकी झिझक टूटी और बातें सेक्स पर आई, और वो एक दूसरे से लिपटने लगे। मुझे लगा कि कहीं वो गे तो नहीं हैं, लेकिन नहीं थे, बस दोस्ताना मस्ती कर रहे थे।

और फिर उनमें से एक ने अनिल का लंड उसकी पैंट के ऊपर से पकड़ के दबा दिया। और फिर तो बाकी सबका ध्यान अनिल पर हो गया, और वो उसके बदन को छूने लगे, गुदगुदाने लगे, उसका सीना शर्ट के ऊपर से दबाने लगे, उसका लंड कभी-कभी पकड़ के मसलने लगे। उन तीनों के लंड भी पैंट में से अच्छा उभार बना रहे थे। अनिल उनको बिल्कुल भी नहीं रोक रहा था, बुरा तक नहीं मान रहा था।

और फिर मेरी ट्यूब-लाइट जली, या कहिए कि हैलोजन जली। तो ये वो लड़के थे।

मैंने चौंक के अनिल से पूछा “ये वो ही हैं जिन्होंने ट्रक में तेरा छोटा सा रेप किया था?”

कमरे में सन्नाटा छा गया। उन सबने चौंक के अनिल को देखा। और अनिल का सर हाँ में हिल ही गया। उसने आजतक मुझसे झूठ नहीं बोला था, शायद किसी से भी झूठ नहीं बोला था।

और फिर उनकी समझ में आया कि अनिल वो क़िस्सा मुझे बता चुका है। ज़ोर का ठहाका लगा। और अब तो मेरा दिया गया शब्द “छोटा सा रेप” उनके मज़ाक़ों का केंद्र बन गया। उन्होंने अनिल को लिपटा लिया और अपनी गोदों में लिटा लिया, अनिल की पैंट खोली और उसका खड़ा लंड बाहर निकाला और सब उसके बदन को सहलाते हुए उसका लंड मसलने लगे।

और कुछ देर में अनिल का माल बहने लगा।

मेरी बाँछे खिल गई। मैंने मुस्करा के नक़ली ग़ुस्से से चिल्लाया। “सालों, मिल के बच्चे का रेप कर दिया था। तुमको इसकी सज़ा मिलेगी।“ और फ़िर मैंने उनमें से एक लड़के के पास जा कर उसको दबोचा और बाकियों को हुक़्म दिया। “नंगा कर साले को।”

बाक़ी दोनों मज़ाक़ को भी समझे और इरादे को भी। वो दबोचा हुआ लड़का “नहीं, नहीं” कर रहा था लेकिन बाकी दोनों ने उससे लिपट गए, और सेकंडों में उसकी पैंट खोल दी, अडीज़ नीचे कर दी। और उसका मोटा लंबा फनफनाया लंड खुला खड़ा था। वो झटपटाता रहा, लेकिन मैंने उसके लंड को मुँह में भर लिया और चूसने लगा। कुछ देर उसका झटपटाना और “नहीं, नहीं” और “छोड़िए” ज़ारी रहा लेकिन फिर उसको मस्ती चढ़ी, डर ख़त्म हुआ कि गाँड नहीं मारी जाने वाली है, तो वो ख़ुद ही सिसकारियाँ भरता मेरे मुँह में अपने लंड से ठसके मारने लगा। अनिल भी अपनी सफ़ाई करके अपने दोस्त का छोटा सा रेप करवाने में मदद करने लगा। उन सबने इस लड़के को पूरा नंगा कर दिया और उसके पूरे बदन को सहलाने, मसलने लगे। और मैं उसका लंड चूसता रहा।

और कुछ देर में उसकी आहों, कराहों के बीच में उसका माल निकल गया। जैसा बी पी में होता है कि दर्शकों को दिखाने के लिए धार बाहर छोड़नी पड़ती है, उसका माल निकलने पर मैंने उसकी दो धारों को उसके लंड को मुँह से निकाल कर भी उसके ही बदन पर झड़ने दिया ताकि बाकी सब देखें, और फिर बाकी माल को मुँह में चूस लिया।

वो लड़का ठंडा हुआ। और फिर तो बाकी दोनों ने ख़ुद ही अपनी पैंटों से अपने खड़े, टनटनाएँ लंडों को बाहर निकाल लिया था, और मुझे पेश कर रहे थे। मैंने उनके चूसने शुरु किए, एक साथ, बदल बदल कर। उन दोनों को भी पूरा नंगा किया गया। उनके भी जिस्म सहलाए गए, और मैंने उनकी गाँडे चाटीं, उनके लंड चूसे और उनके भी माल धार के धार निकले।

तीनों ठंडे हो गए थे, लेकिन अनिल का लंड फिर खड़ा हो गया था। अब अनिल को पूरा नंगा किया गया, और उन्होंने उसके बदन को सहलाया और मैंने अनिल का लंड चूसा, उसकी गाँड चाटी।

फिर तो बियर खुलती रहीं, सिगरेटें सुलगती रही, बीपी चलती रही, और वो चारों नंगे बैठे रहे, और मैं उनके पूरे जिस्मों को चूमता चाटता रहा, उनके होंठों और निप्पल्स को चूसता रहा। उनकी गाँडें और अँडवों को चाटता रहा, उनके लंडों को चूसता रहा, उनकी गाँडों में थूक भरी उँगली डालता रहा, और उनके माल निकलते रहे, निकलते रहे, निकलते रहे।

फिर सब पर चढ़ गई, और सब वैसे ही सो गए। लेकिन बियर का चढ़ना एक बार मूतने तक ही रहता है, थोड़ी देर में सब उठे, चारों जा के एक साथ नंगे नहाए। और फिर तैयार हो कर, हज़ार बार मुझे धन्यवाद देकर जाने लगे।

एक सवाल मेरे मन में उठ रहा था। मैंने अनिल से पूछा “तूने बताया था, वो चार थे। वो चौथा अब टच में नहीं है क्या? आया नहीं शादी पे।“

और फिर अनिल ने बताया “वो चौथा लड़का भूपेन ही था।

उन तीनों ने मुझे देखा, अनिल को देखा। उनकी समझ में आया कि भूपेन मुझसे मिल चुका है, और उसके साथ भी हुआ ही होगा। हँसते-हँसते हम सब के पेट में बल पड़ गए। फिर मज़ाक़ लेग-पुलिंग हुई।

और फिर वो चले गए। बाकी तीनों के साथ नंबर एक्सचेंज हो गए थे।

और वो तीनों फिर तो कई बार आते रहे जब भी वो शहर आते थे, कभी अकेले, कभी दो-तीन। और उनके साथ यही सब होता था। जब कोई अकेले आता था तो मैं उसकी गाँड भी मारता था।

अनिल और भूपेन फिर कभी नहीं आए। वो दोनों एक दूसरे के थे।

अनिल का एक बार और फ़ोन आया और उसने सारी बात बताई। भूपेन ही वो बचपन वाला पहलवान था जिसने अनिल का छोटा सा रेप करवाया और करा था और जिसका खड़ा होता मोटा लंबा कड़क लंड अनिल ने पहली बार उसकी गोद में सिर रख कर ट्रक में सोते हुए महसूस किया था। तब से दोनों तड़प रहे थे एक दूसरे को अपना बनाने के लिए, एक दूसरे के बनने के लिए, लेकिन आठ-दस साल तक दोस्ती की मर्यादा को तोड़ने का मन नहीं बना पाए थे। और तब अनिल मुझसे मिला था, और मैंने उसे कली से फूल बनाया था। और फिर जब भूपेन ही उसका रूम पार्टनर बना था, तब भी भूपेन अनिल का लंड हिलाता रहता था, और तब अनिल प्लान बना कर भूपेन को मेरे पास लाया था क्योंकि वो जानता था कि मैं भूपेन से ज़रूर करूँगा और उससे शायद उसका भूपेन के साथ होने का कोई रास्ता बने। और वही हुआ भी था। भूपेन की गाँड मारना अनिल के प्लान में नहीं था, लेकिन वो मेरे हुक़्म को टाल नहीं पाया था, और कर गया। भूपेन तो दोस्त की ख़ातिर सब कुछ के लिए तैयार था।

अनिल ने बताया कि फिर एक दिन हॉस्टल रूम में उसने भूपेन का लंड चूस ही लिया था और फिर भूपेन ने भी उसका लंड पहली बार चूसा था। और फिर एक दिन भूपेन ने अनिल की गाँड मार ही ली थी और अनिल की दस साल की तमन्ना पूरी हुई थी। बहुत मज़ा आया था। तब से वो दोनों एक दूसरे से बहुत ख़ुश थे। मेरे पास तो वो मस्ती के लिए ही आते थे। अब जब मन करें, एक दूसरे के साथ ही कर लेते थे, इसलिए तब से उन्होंने मेरे पास आना बंद कर दिया था और अब कभी नहीं आएँगे। उसने सॉरी बोला। मैंने कहा “कोई बात नहीं। अच्छा ही है। तुम दोनों एक उम्र के हो, पहले से जानते हो, तुम दोनों का एक दूसरे के लिए ही हो कर रहना ज़्यादा अच्छा है।“

मुझसे कई छोटी उम्र के लड़के आजकल पूछते हैं कि मेरी ज़िंदग़ी में मेरा कोई अफ़ेयर, कोई ब्वायफ्रेंड रहा है क्या। मैं उन्हें नहीं समझा पाता कि यह मेल-टू-मेल प्रपोज़ मारना, अफ़ेयर, ब्वायफ्रेंड बनना बनाना, उससे शादी करना, ये सब नेट से आई हुई आजकल की जागरूकता का नतीज़ा है। उस ज़माने में जब नेट, मोबाइल वग़ैरह नहीं थे, या इतने प्रचलित नहीं थे, तब भी गे रिलेशन तो होते थे, लेकिन ढके-छुपे होते थे और हम लोग सब कुछ करते थे, लेकिन कोई लाइफ़ प्लानिंग नहीं हो पाती थी। हम सब जानते थे कि हमारी लड़कियों से शादी होगी, और हम बच्चे पैदा करेंगे। लड़के के साथ, जब तक मौक़ा है तब तक ही चल सकता है।

अनिल भी ये समझता था, उसने बताया कि भूपेन भी समझता है कि शादी-बच्चे तो शाश्वत सत्य है, लेकिन जब तक ये चल पा रहा है, तब तक वो एक दूसरे के साथ ख़ुश हैं। वो एक दूसरे को प्रपोज़ मारे बिना, किसी फ़ॉर्मली डिक्लेयर्ड अफ़ेयर के बिना, या फ़ॉर्मली ब्वायफ़्रेंड बने बिना ही वो सब ही कर रहे थे। मैंने उसे सब कुछ के लिए धन्यवाद दिया। उसके इस नए संबंध के लिए बधाई दी।

वो दोनों फिर कभी नहीं आए। भूपेन से तो फ़ॉर्मल आख़िरी मुलाक़ात भी नहीं हो पाई थी। बाकी तीनों का भी धीरे-धीरे आना बंद हो गया था। लेकिन ठीक था। वो दोनों ख़ुश थे। मुझे और लड़के मिलते रहते थे।

हाँ, एक कसक रह गई थी कि दीपक और पवन पर मेरा सारा फ़ेल हो गया था और मेरी उनके साथ मस्ती नहीं हो पाई थी।

अब तो वो सब 28-30-32 के हो गए होंगे, कई सालों से नहीं मिले हैं हम। उनकी शादियाँ हो चुकी होंगी, वो सब मुझे चाचा या ताऊ या दादाजी बना चुके होंगे। अपनी नौकरियों या बिजनेस में लग चुके होंगे। जवानी की अल्हड मस्ती के मज़े लेने के बाद अपनी सामाजिक और पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे होंगे।

वो जहाँ भी हों भगवान उनको ख़ुश रखे, स्वस्थ रखे, सफल बनाए।

ख़ुशनुमा यादें ही ज़िंदग़ी की सच्ची दौलत हैं.

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